Thursday, 15 January 2015

शानी और यशपाल

मेरी दृष्टि में यशपाल हिंदी के एक बहुत बड़े कहानीकार हैं...मेरे लिए वो लगभग एक आदर्श पुरुष की तरह रहे हैं…. सीधी साधी शब्दावली में प्रेमचंद हमारे पुरखे हैं तो बाप के बारे में कुछ कहने की कोई बात ही नही होती.....लेकिन जिनसेआप सीखतेहैं, जिनको आप समानांतर रखकर देखते हैं और पहचानने की कोशिश करते हैं और जिनके बीच में से आप अपनी राह निकालना चाहते हैं अपने लिए उस वक़्त जो बड़े लेखक थे और आज भी जिन्हें मैं बड़े लेखकों में शुमार करता हूं जैनेन्द्र, अज्ञय और यशपाल...मैंने बहुत ग़ौर से तीनो की एक एक रचना बरसों एक नहीं दो दो बार पढ़ी....जैनेन्द्र की भाषा, उनकी एक ख़ास तरह की दृष्टि और एक बेलौस और बेलाग नज़रिया..नारी के लिए एक ख़ास तरह का वो नज़रिया नहीं जो यशपाल का है बल्कि वो जो खुद का यशपाल का था जो बेहद क्रांतिकारी रहा है और जो मुझे त्यागपत्र की बुआ में नज़र आया था...और वो पैशन जो केवल अज्ञय जी में था लेकिन जो पैशन मुझे यशपाल जी में नही मिला लेकिन यशपाल जी की वो दृष्टि जो पर्दा जैसी कहानी में मिलती है..वो दृष्टि जो मुझे गंडेरी जैसी कहानी में मिलती है या यशपाल के भारतीय जीवन के दस्तावेज़ के रुप मे पढ़े गए उपन्यास झूठा सच मेंजो मिलता है....मैं इनमे से कोई एक तो क्या होता लेकिन अगर तीनो के बीच में से मैं कोई अपना रास्ता निकाल सकूं तो मुझे अपने लिए सार्थक जीवन की तलाश लगेगी...तो लिहाज़ा यशपाल जी मेरेआदर्श पुरुष रहे हैं, वो दृष्टि आज भी मुझे रास्ता दिखाती है, मुझे दृष्टि यही चाहिए...ये मेरी मजबूरी नहीं है लेकिन उसमें संगठन नही है...वो मेरे जीवन की विवषशता है...जिस जीवन में मैं रहा हूं, जिस वर्ग से मैं आया हूं जो ज़िंदगी मुझे घेरे रही है बरसह बरस....

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