Thursday, 15 January 2015

शानी का कविता प्रेम

बहुत कम लोग जानते हैं कि शानी जी कहानीकार और उपन्यासकार के अलावा न सिर्फ कविताओं की अच्छी समझ रखते थे बल्कि खुद कुछ कविताएं भी लिखी...यहां मैं अनुवादित कुछ कविताएं पोस्ट कर रहा हूं शायद आप लोगों को पसंद आएं.......

खोज

1) बर्फ़ के तारे
पहाड़ियां चाहती हैं
पानी हो जाएं
और पीठ में खोजती हैं वे
टिकने के लिए खोजती हैं वे
सितारे!!!

2) बादल
और चाहती हैं पहाड़ियां
निकल आएं उनके पंख
और खोजती हैं वे
बादल
सफ़ेद बुर्राक़!!!!

3) बर्फ़
तारे हो रहें हैं बेपर्द
झरते हैं पठारों पर
सितारों के लिबास
ज़रुर आएंगे तीरथ यात्री
और खोजेंगे आर्तनाद
कल के बुझे हुए अलाव!!!!!!!!

सिरफिरा गीत
मां,
चांदी कर दो मुझे
बेटे,
बहुत सर्द हो जाओगे तुम
मां,
पानी कर दो मुझे
बेटे,
जम जाओगे तुम बहुत
मां,
काढ़ लो मुझे तकिए पर
कशीदे की तरह
कशीदा!!!!!
हां,
आओ

सुनहरी लड़की का क़सीदा
तालाब में नहा रही थी
सुनहरी लड़की
और तालाब सोना हो गया
कंपकपी भर गए उसमें,
छायादार शाख़ और शैवाल
और गाती थी कोयल
सफ़ेद पड़ गई लड़की के वास्ते
आई उजली रात
बदलियां चांदी की गोटों वाली
खलवाट पहाड़ियों और बदरंग हवा के बीच
लड़की थी भीगी हुई जल में सफेद
और पानी था दहकता बेपनाह
फिर आई ऊषा
हज़ारों चेहरों में
सख्त और लुके-छुपे
मुंजमिद गजरों के साथ
लड़की आंसू ही आंसू
शोलों में नहायी
जबकि स्याही पंकों में
रोती थी कोयल
सुनहरी लड़की थी
सफेद बगुली
और तालाब हो गया था सोना!!!!!
काले फ़ाख्तों का कसीदा
चम्पा की शाख़ों के बीच
मैंने देखे दो स्याह फ़ाख्ते
सूरज था एक
चांद था दूसरा
प्यारे दोस्तों,
कहां है मकॉबरा मेरा, मैंने पूछा
मेरी दुम में, सूर्य ने कहा
हलक़ में मेरे, चांद बोला
और कमर कमर तक मिट्टी में
चलते हुए मैंने देखे
दो बर्फ़ानी उक़ाब
और एक लड़की निर्वस्त्र
दोनों थे एक
और लड़की न तो ये थी न तो वो
प्यारे दोस्तों,
कहां है मकॉबरा मेरा, मैंने पूछा
मेरी दुम में, सूर्य ने कहा
हलक़ में मेरे, चांद बोला
चम्पा की शाख़ों के बीच
मैंने देखे दो फ़ाख्ते निर्वस्त्र
दोनों थे एक
और दोनों न तो यह और न वो!!!!!!
मूल: फेदरिको गार्सिया लोर्का
अनु: शानी

शानी और यशपाल

मेरी दृष्टि में यशपाल हिंदी के एक बहुत बड़े कहानीकार हैं...मेरे लिए वो लगभग एक आदर्श पुरुष की तरह रहे हैं…. सीधी साधी शब्दावली में प्रेमचंद हमारे पुरखे हैं तो बाप के बारे में कुछ कहने की कोई बात ही नही होती.....लेकिन जिनसेआप सीखतेहैं, जिनको आप समानांतर रखकर देखते हैं और पहचानने की कोशिश करते हैं और जिनके बीच में से आप अपनी राह निकालना चाहते हैं अपने लिए उस वक़्त जो बड़े लेखक थे और आज भी जिन्हें मैं बड़े लेखकों में शुमार करता हूं जैनेन्द्र, अज्ञय और यशपाल...मैंने बहुत ग़ौर से तीनो की एक एक रचना बरसों एक नहीं दो दो बार पढ़ी....जैनेन्द्र की भाषा, उनकी एक ख़ास तरह की दृष्टि और एक बेलौस और बेलाग नज़रिया..नारी के लिए एक ख़ास तरह का वो नज़रिया नहीं जो यशपाल का है बल्कि वो जो खुद का यशपाल का था जो बेहद क्रांतिकारी रहा है और जो मुझे त्यागपत्र की बुआ में नज़र आया था...और वो पैशन जो केवल अज्ञय जी में था लेकिन जो पैशन मुझे यशपाल जी में नही मिला लेकिन यशपाल जी की वो दृष्टि जो पर्दा जैसी कहानी में मिलती है..वो दृष्टि जो मुझे गंडेरी जैसी कहानी में मिलती है या यशपाल के भारतीय जीवन के दस्तावेज़ के रुप मे पढ़े गए उपन्यास झूठा सच मेंजो मिलता है....मैं इनमे से कोई एक तो क्या होता लेकिन अगर तीनो के बीच में से मैं कोई अपना रास्ता निकाल सकूं तो मुझे अपने लिए सार्थक जीवन की तलाश लगेगी...तो लिहाज़ा यशपाल जी मेरेआदर्श पुरुष रहे हैं, वो दृष्टि आज भी मुझे रास्ता दिखाती है, मुझे दृष्टि यही चाहिए...ये मेरी मजबूरी नहीं है लेकिन उसमें संगठन नही है...वो मेरे जीवन की विवषशता है...जिस जीवन में मैं रहा हूं, जिस वर्ग से मैं आया हूं जो ज़िंदगी मुझे घेरे रही है बरसह बरस....